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Sunday, July 31, 2016

जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे…

साल 2014 जिन शख्सियतों की जिंदगी का अहम पड़ाव है, उनमें ग़ज़ल साम्राज्ञी बेगम अख्त़र का नाम भी शामिल है. बेगम की याद में पूरे साल देशभर में जलसे और संगीत कार्यक्रम होते रहे, क्योंकि यह उनकी पैदाइश का सौंवा साल था. अगर सितारों के बीच कहीं से बेगम देख रही होंगी, तो फख्र कर रही होंगी कि जिस माटी से उन्होंने मुहब्बत की थी, उसने उन्हें भुलाया नहीं है


2015-01-15 , Issue 1 Volume 7 

 
दूरदर्शन के एक प्रसारण में कैफ़ी आजमी से पूछा गया- आपकी पहचान नज़्मों के लिए रही है, ग़ज़लें आपने बहुत कम कही हैं. लेकिन इन दिनों आप फिर से ग़ज़लें कहने लगे हैं. इसकी क्या वजह है? कैफ़ी ने जवाब दिया, ‘मैंने वापस ग़ज़लें कहना उसी वजह से शुरू किया जिस वजह से ग़ालिब मुसव्विरी सीखना चाहते थे. मैं ग़ज़ल इसलिए कहता हूं ताकि मैं ग़ज़ल यानी बेगम अख़्तर से नज़दीक हो जाऊं.कैफ़ी आज़मी का ये जुमला बेगम अख़्तर की शख़्सियत के बारे में बहुत कुछ कह जाता है. वो सचमुच हमारे मुल्क, बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में ग़ज़ल का दूसरा नाम हैं. किसी भी महफिल में जब ग़ज़ल का ज़िक्र छिड़ता है, तो बात बेगम अख़्तर से ही शुरू होती है और उन्हीं पर आकर ख़त्म होती है. बेगम अख़्तर ने ग़ज़ल गायिकी को और ग़ज़ल गायिकी ने बेगम अख़्तर को बेपनाह शोहरत अता की. कोठे से उतरी ठेठ दरबारी शैली की ग़ज़ल गायिकी को आवाम के बीच रचा-बसा देने का करिश्मा वही कर सकती थीं.
ग़ज़ल उनकी गायिकी का सबसे दिलकश अंदाज़ ठहरा, लेकिन उनकी ज़ंबील में ग़ज़ल के अलावा ठुमरी, चैती, दादरा, ख़याल आदि विधाओं के भी बेशुमार नगीने हैं. उपशास्त्रीय गायन का सम्मोहन बेगम अख़्तर के यहां अपने शबाब पर दिखता है. जो कुछ भी उन्होंने गाया, यूं लगा कि वो बेगम के लिए ही बना है और बेगम भी उसी के लिए ही बनी हैं. उनके अनन्य प्रशंसक यतीन्द्र मिश्र उनकी गायिकी को विश्लेषित करते हुए लिखते हैं, ‘उनकी शास्त्रीय संगीत की परंपरा पटियाला घराने के उस्ताद अता मोहम्मद ख़ान और किराना घराने के दिग्गज उस्ताद अब्दुल वाहिद ख़ान से संबद्ध रही है. वे जहां पटियाला घराने की गंभीर गायकी में अपने उस्ताद से ग़ज़ल, ठुमरी और दादरा सीखने में व्यस्त रहीं, ठीक उसी समय उन्हें किराना घराने के ख़याल की बारीकियों को सीखने का अवसर मिला. बेग़म अख़्तर की पूरी संगीत यात्रा, इन्हीं दो घरानों के बीच किसी नाजुक बिन्दु पर संतुलित मिलती है’. यतीन्द्र के मुताबिक उनके लिए संगीत सिरजना सिर्फ़ राग, ताल और धुनों पर ही आधारित काम नहीं था, बल्कि वे गीत के शब्दों और बोलों की सटीक अर्थ-व्याप्ति के लिए भावों को बहुत गौर से बरतने में तल्लीन दिखाई पड़ती हैं.
बिब्बी से अख़्तरी, अख़्तरी से अख़्तरीबाई फैज़ाबादी और अख़्तरीबाई फैज़ाबादी से बेगम अख़्तर बनने के सफ़र में ग़म और गायिकी दोनों उनके हमसफ़र बने रहे
बेगम अख़्तर की गायिकी के इस वैभव के नज़दीक जाने के लिए उनके जीवन के नज़दीक जाना जरूरी है. अंतिम दिनों में एक उद्घोषिका ने रेडियो पर उनको बेग़म अख़्तर कह कर संबोधित कर दिया, तो बेगम ने उससे कहा, ‘बेटी पूरी ज़िंदगी तो ग़मों के बीच ही गुज़री है, मैं बेग़म कहां हूं?’ बिब्बी से अख़्तरी, अख़्तरी से अख़्तरीबाई फैज़ाबादी और अख़्तरीबाई फैज़ाबादी से बेगम अख़्तर बनने के सफ़र में ग़म और गायिकी दोनों उनके हमसफ़र बने रहे. जन्म फैज़ाबाद के करीब भदरसा कस्बे में जुड़वा बहन के साथ 7 अक्टूबर 1914 को हुआ. नाम मिला बिब्बी उर्फ अख़्तरी. उनकी मां मुश्तरीबाई अपने ज़माने की मशहूर गानेवाली थीं, जबकि वालिद सैयद असग़र हुसैन सिविल जज थे, जिन्होंने मुश्तरी को किसी महफिल में सुना था और फिर दूसरी बीवी के तौर पर अपने घर ले आए थे. अख़्तरी अभी तीन साल की भी नहीं हुईं थीं कि उनकी जुड़वा बहन अनवरी का इंतक़ाल हो गया और इसके थोड़े ही वक्त बाद उनके वालिद ने उनकी मां मुश्तरी को छोड़ दिया. मां पर पड़ी दुखों की इस दोहरी मार को अख़्तरी ने भी बहुत छोटी उम्र में ही न केवल महसूस किया, बल्कि उनके साथ-साथ भोगा भी. अख़्तरी की मां उनके सबसे नज़दीक थीं. उनकी पूरी शख़्सियत पर मां की अटूट छाप दिखाई देती है. मां ने तमाम मुसीबतों और मुफ्लिसी के बीच जिस तरह अख़्तरी की तरबियत की, वो भी अपने आप में एक मिसाल है. आकाशवाणी के लिए बेगम अख़्तर के जीवन पर कुछ नक़्श तेरी याद केजैसा चर्चित धारावाहिक लिखने वाले पत्रकार अटल तिवारी मुश्तरी के बारे में एक महत्वपूर्ण बात कहते हैं- मुश्तरी ने जिस तरह का अविश्वसनीय संघर्ष अपनी बेटी का मुस्तकबिल संवारने के लिए किया, वो उन्हंे किसी प्रेरणाप्रद नायिका की तरह सामने लाता है. उस वक़्त के समाज में बेटी को अकेले पालना, उसे कोठे की रिवायत से निकालने के लिए अलग-अलग शहरों में ले जाकर बड़े-बड़े उस्तादों से तालीम दिलवाना, बेटी की तालीम के लिए अपना सब कुछ बेच देना वगैरह इस बात की बानगी है कि मुश्तरी में किस दर्जे की दूरदर्शिता, प्रगतिशीलता और विद्रोह था.

बचपन की पढ़ाई-लिखाई में अख़्तरी का ज्यादा मन नहीं लगा, अलबत्ता फैज़ाबाद के मिशन स्कूल में वो टीचर की चोटी काट देने जैसे कारनामों से ज़्यादा जानी जाती रहीं. लेकिन मां से नज़दीकी की वजह से गायिकी की तरफ बचपन से ही उनका संजीदा रुज्हान रहा. इसे देखते हुए मां ने मशहूर सारंगी वादक इमदाद अली खां से अख़्तरी को सिखाने को कहा. अख़्तरी ने अभी सीखना शुरू ही किया था कि फैज़ाबाद में उनका घर जला दिया गया. पतियों द्वारा छोड़ी जा चुकी तवायफों के ऊपर इस तरह के ख़तरे उन दिनों आम थे. फैज़ाबाद से दाना-पानी उठने के बाद मां-बेटी ने बिहार के गया का रुख किया. गया पहुंचने के बाद मुश्तरी ने बेटी की संगीत शिक्षा की तरफ और संजीदगी से ध्यान दिया. गहने, बर्तन बेच-बेचकर उन्होंने बेटी को पहले सख़ावत हुसैन और फिर पटियाला घराने के उस्ताद अता मोहम्मद से तालीम दिलवाई. मां के अलावा अख़्तरी की गायिकी पर बुनियादी असरात अता मोहम्मद के ही दिखते हैं. सीखा भी अख़्तरी ने सबसे ज़्यादा उन्हीं से.
अख़्तरी की पूरी शख़्सियत पर मां की अटूट छाप दिखाई देती है. मां ने तमाम मुसीबतों और मुफ्लिसी के बीच जिस तरह अख़्तरी की तरबियत की, वो भी अपने आपमें एक मिसाल है
1924 में अख़्तरी मां के साथ कोलकाता चली आईं, जो उस वक्त गीत, संगीत और नाटक का गढ़ था, फिल्म इंडस्ट्री भी वहीं थी. अता मोहम्मद से उनकी तालीम लंबे वक्त तक जारी रही. इसके बाद उन्होंने उस्ताद अब्दुल वाहिद खां और अंत में झंडे खां से सीखा. इस दरमियान अख़्तरी कोलकाता की छोटी-मोटी निजी नशिस्तों में जाने लगी थीं. लेकिन कोलकाता में उनकी गायिकी ने पहले-पहल धूम सिर्फ बीस साल की उम्र में 1934 में मचाई, जब भारत कोकिला सरोजिनी नायडू की मौजूदगी में उन्होंने बिहार भूकंप पीड़ितों की मदद के लिए एक आयोजन में स्थानापन्न कलाकार के बतौर गाते हुए सैंकड़ों दर्शकों पर जादू कर दिया था. इस जलसे की तब के कलकत्ता में बड़ी चर्चा हुई और इसी के बाद अख़्तरी अख़्तरीबाई फैज़ाबादी बन गईं. लेकिन गाने वाली बाइयों के साथ होनेवाला व्यवहार उन्हें हमेशा सालता रहा. इस सिलसिले में उनका क़ौल मशहूर है, ‘इस समाज को क्या कहा जाए, जहां मर्द अच्छा गाता है, तो उस्ताद या पंडित कहलाता है और औरत अच्छा गाती है तो बाई कहलाती है.
1934 में ही मेगाफोन कंपनी के मालिक जेएन घोष ने उन्हें छह ग़ज़लें रिकॉर्ड करने का प्रस्ताव दिया, जिसे अख़्तरी ने कुबूल कर लिया. रिकॉर्ड की गई उनकी पहली ग़ज़ल थी, वो असीरे दामे बला हूं. मेगाफोन द्वारा जारी किया गया ये रिकॉर्ड चल निकला और अख़्तरी ने पहली बार शोहरत का स्वाद महसूस किया. इसके बाद उनके ठुमरी, दादरा, चैती और ख़याल गायिकी के भी कई रिकॉर्ड्स निकले और कामयाब रहे. जिसके चलते 1936 में ऑल इंडिया रेडियो, कोलकाता ने भी उन्हें रिकॉर्ड किया. इस बीच वो बतौर अभिनेत्री फिल्म और थिएटर में भी काम करना शुरू कर चुकी थीं. लैला मजनूं (1934) और नई दुल्हन (1934) उनके मशहूर नाटक थे. साथ ही नल दमयंती (1933), एक दिन का बादशाह (1933), मुमताज़ बेगम (1934), अमीना (1934), रूपकुमारी (1934), जवानी का नशा (1935), नसीब का चक्कर (1936) जैसी फिल्मों में बतौर मुख्य अभिनेत्री काम करने के बाद उनकी शोहरत अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई थी और इसका सीधा फ़ायदा उनकी व्यावसायिक गायिकी की साख को हुआ था. मेगाफोन कंपनी अब उनके रिकॉर्ड्स का बाकायदा विज्ञापन जारी करती थी, जिस पर उनका परिचय लिखा होता था- अख़्तरीबाई फैज़ाबादी फिल्म स्टार’. इस दौरान एक फिल्म कंपनी बिना उनका बकाया चुकाए बंद हो गई, तो उन्होंने उस पर मुकदमा करने की भी ठान ली. इसी सिलसिले में 1937 में लखनऊ के बैरिस्टर इश्तियाक़ अहमद सिद्दीक़ी से उनकी पहली मुलाक़ात हुई थी. इतना ही नहीं अब उन्हें हिंदुस्तान के प्रमुख दरबारों से ख़ुसूसी न्यौता भी मिलने लगा था. निज़ाम हैदराबाद ने उनके लिए सौ रुपये प्रतिमाह का वज़ीफ़ा मुक़र्रर कर दिया था, तो नवाब रामपुर ने उन्हें अपने दरबार में अहम पदवी से नवाजा था. अख़्तरी अब आधा वक्त रामपुर में और आधा लखनऊ में गुज़ारने लगी थीं.
1924 में अख़्तरी कोलकाता आईं, जो उस वक्त गीत, संगीत और नाटक का गढ़ था. कोलकाता में उनकी गायिकी ने पहले-पहल धूम सिर्फ बीस साल की उम्र में मचाई
1938 में अख़्तरी ने लखनऊ में अपना ख़ुद का घर बनवाया, वो भी हज़रतगंज जैसे इलाके के पास. ये कदम उनके रुतबे का पता देता है, क्योंकि उस वक्त तक लखनऊ की ज़्यादातर गानेवालियां चौक या दूसरे इलाक़ों की गलियों में रहती आईं थी. हज़रतगंज के आसपास उनका क़याम कभी नहीं रहा था. अख़्तरी ने ये दस्तूर बदला, क्योंकि शहर के ज़्यादातर रईस हज़रतगंज के आसपास ही रहते थे. व्यावसायिक तौर पर ये जगह उनके लिए ज़्यादा मुफ़ीद थी. फिल्म अभिनेत्री होने के बावजूद उनकी ज़्यादा मज़बूत पहचान गायिका की ही थी. रामपुर दरबार से जुड़ जाने के बाद भी लखनऊ में वो महफ़िलों का हिस्सा लगातार बनी रहीं. मशहूर गायिका मालिनी अवस्थी बेगम की गायिकी के बारे में दो महत्वपूर्ण बातें कहती हैं, ‘पहली बात तो ये है कि वो जिस मिट्टी की थीं यानी लखनऊ-फैज़ाबाद उसके संगीत की तमाम विधाओं को उन्होंने इस ख़ूबी के साथ गाया कि वो सभी पूरी दुनिया में पहुंच गईं. ठुमरी, दादरा, चैती, होरी, कजरी, मर्सिया, ग़ज़ल सब कुछ. उन्होंने अपने आपको कभी किसी एक विधा (जैसे ग़ज़ल) में महदूद नहीं किया. ये काम उनके चाहनेवालों ने किया. दूसरी बात कि उन्होंने कठिन चीज़ें भी जिस सहजता से गा दी हैं, वो बताता है कि उनकी अपनी आवाज़ पर कितनी पकड़ थी, कितनी समझ थी, कितना परिचय था. ये लंबे रियाज़ के बाद आता है. इसी का नतीजा है कि बेगम जब गाती हैं, तो बेहद कठिन चीज़ को भी बेहद आसानी से निभा ले जाती हैं और साधारण से साधारण श्रोता को भी मंत्रमुग्ध कर देती हैं.
1940 के आस पास उनका फ़िल्मों से जी उचाट होने लगा था. क्योंकि उनके उस्ताद अता मोहम्मद को उनका फिल्मों में काम करना गायिकी के साथ अन्याय लगता था. वे इसके ख़िलाफ़ थे. नवाब रामपुर भी उनके फ़िल्मों में काम करने के पक्ष में नहीं थे. इसलिए महबूब खान की फिल्म रोटी (1942) के बाद उन्होंने फिल्मों से किनारा कर लिया. अब वो पूरा ध्यान अपनी गायिकी पर देने लगीं. उम्र अब तीस के करीब पहुंच रही थी, इसलिए लड़कपन की शोख़ी भी अब संजीदगी में बदल रही थी. ज़िंदगी एक दूसरे तरह का स्थायित्व चाह रही थी. नवाब रामपुर ने उनसे शादी करने की ख्वाहिश भी जताई, लेकिन अख़्तरी ने ख़ुद को नाचीज़ कहते हुए प्रस्ताव ठुकरा दिया. उन्होंने अपने लिए लखनऊ के बैरिस्टर अब्बासी को चुना, जिनसे उनकी पुरानी आश्नाई थी. दोनों एक-दूसरे के क़ायल भी थे. मगर अख़्तरी के गाने-बजाने का पेशा अब्बासी और उनके बीच दीवार बना हुआ था. फिर एक दिन अख़्तरी ने फैसला किया कि वो गाना छोड़कर अब्बासी का हाथ थामेंगी. हुआ भी ऐसा ही. 1945 में अख़्तरी बाई फैज़ाबादी बेगम अख़्तर बन गईं और गायिकी से उनका रिश्ता टूट गया.
फिल्म अभिनेत्री होने के बावजूद अख्तरी की ज़्यादा मज़बूत पहचान गायिका की ही थी. रामपुर दरबार से जुड़ने के बाद भी लखनऊ में वो महफ़िलों का हिस्सा लगातार बनी रहीं
बेगम दुनिया में गाने के लिए ही आईं थीं. उनकी मां ने उनको ढाला भी ऐसे ही था. बेगम के हज़ारों चाहनेवालों को उनके गाना छोड़ने का रंज था. इस बात से सबसे ज़्यादा दुखी उनकी मां मुश्तरी ही थीं. उन्होंने अपना पूरा जीवन अख़्तरी के लिए वक़्फ कर दिया था. मुसीबतें उठा-उठाकर उनको तालीम दिलवाई थी. यहां तक कि अख़्तरी जब स्टार बन गईं थीं, तब भी मुश्तरी उनके एक-एक कदम का हिसाब रखतीं थीं और उनको गाहे-बगाहे सलाह भी देती रहती थीं. बेगम ने गाना छोड़ा, तो उनकी मां पूरा-पूरा दिन उनके रिकॉर्ड सुनती रहतीं और रोती रहतीं. खुद बेगम अख़्तर की हालत गाने के बिना बेहाल थी. अब वो अकेलेपन और अवसाद में घिर गईं थीं, जिसने धीरे-धीरे कई बीमारियों को दावत दे दी थी. तबीयत जब ज़्यादा ख़राब हुई, तो डाक्टरों ने उनके पति अब्बासी से कहा कि अब इन्हें गाने की इजाज़त दे दी जाए, तभी तबीयत संभल सकती है. आख़िरकार शौहर ने हारकर बेगम को वापस गाने के लिए कहा. इसके बाद बेगम ने चार साल के तवील अंतराल के बाद 1949 में ऑल इंडिया रेडियो के लिए रिकॉर्डिंग की.संगीत के साथ जैसे उन्हें जीवन वापस मिल गया था. गाना दोबारा शुरू करते हुए उन्हें यह डर था कि पता नहीं इतने समय बाद वो गा भी पाएंगी या नहीं और लोगों पर उनका जादू वैसे ही चलेगा या नहीं. लेकिन जब उन्होंने गाया तो दोबारा उसी तरह की बेपनाह मकबूलियत पाई. ख़ासतौर पर इस दौर में गाई उनकी ग़ज़लों में तो एक अलग ही तासीर मिलती है. वो सारा दर्द जो उन्होंने गायिकी से दूर रहकर बीमारी में भोगा, इन ग़ज़लों में उजाले की तरह चमकता है. ऐसी तड़प उनकी पहले दौर की गायिकी में नहीं थी. हालांकि उसमें भी वो कशिश मौजूद है जो हमेशा बेगम अख़्तर की गायिकी का हुस्न बनी रही. हैरत की बात ये है कि गायिकी की वजह से ज़्यादातर कलाकार खाने-पीने में जिस तरह का परहेज़ करते हैं वो भी उन्होंने कभी नहीं किया. वो अपनी आवाज़ को ख़ुदा की देन मानती थीं. इसी के चलते रिकॉर्डिंग के दिन भी अचार से लेकर आईसक्रीम तक सब चाव से खाती थीं और सिगरेट भी पीती थीं. उनकी शेरफहमी कमाल की थी. यही वजह है कि रागदारी की रियाज़त में भी उन्होंने शेर के हुस्न को बरकरार रखा. जब वो गा रही होतीं तो बैकग्राउण्ड में साज़िन्दों को साज़ लगभग गुम रखने की ताकीद थी ताकि शेर पूरा उभर कर आए. ग़ज़ल के अलावा उपशास्त्रीय संगीत की दूसरी विधाओं जैसे ठुमरी, दादरा और ख़याल गायिकी में भी उनका अंदाज़ एकदम मौलिक था. गायिकी में पंजाब और पूरब अंग का जैसा अद्भुत समन्वय उन्होंने किया उसने बेगम अख़्तर को एकदम निराला बना दिया. हालांकि विशुद्ध शास्त्रीय गायन में उनकी ज़्यादा रुचि नहीं रही, लेकिन ग़ज़ल और दूसरी चीज़ें गाते हुए वो बिल्कुल शास्त्रीय संगीत जैसा माहौल रच देती थीं.
1945 में लखनऊ के बैरिस्टर अब्बासी को अपना हमसफ़र चुना. इसके बाद अख़्तरी बाई फैज़ाबादी बेगम अख़्तर बन गईं और गायिकी से उनका रिश्ता कुछ साल के लिए टूट गया
1951 में कोलकाता में हुए संगीत सम्मेलन में भी उन्होंने शिरकत की, जिसमें शास्त्रीय संगीत के बड़े-बड़े पुरोधा हिस्सा ले रहे थे. यहां भी वो बेहद कामयाब रहीं. आमजन के अलावा कई पंडितों-उस्तादों ने भी उनकी जी खोलकर तारीफ़ की. भारत रत्न मरहूम बिस्मिल्ला खां ने एक दफा बेगम अख़्तर की गायिकी के बारे में बात करते हुए कहा था- बेगम अख़्तर के गले में एक अजीब कशिश थी. जिसे अकार की तान कहते हैं, उसमें अ करने पर उनका गला कुछ फट जाता था और ये उनकी ख़ूबी थी. मगर शास्त्रीय संगीत में यह दोष माना जाता है. एक बार हमने कहा कि बाई कुछ कहो. ज़रा कुछ सुनाओ. वे बोलीं-अमां क्या कहें, का सुनाएं. हमने कहा कुछ भी. बेगम गाने लगीं- निराला बनरा दीवाना बना दे. एक दफे, दो दफे कहने के बाद जब दीवाना बना दे में उनका गला खिंचा तो हमने कहा अहा ! यही तो सितम है तेरी आवाज़ का. वो गला दुगुन-तिगुन के समय लहरा के मोटा हो जाता था. वही तो कमाल था बेगम अख़्तर में.
दोबारा गाना शुरू करने के बाद जल्द ही बेगम की ज़िंदगी पटरी पर आ गई थी. उनके पास लगातार गाने के प्रस्ताव आ रहे थे. लेकिन इसी बीच 1951 में ही उनकी मां मुश्तरी की मौत के बाद वो तीन-चार महीने फिर संगीत से दूर रहीं. सदमे में थीं. उनका ज़्यादातर वक्त लखनऊ के पसंदबाग़ स्थित अपनी मां की कब्र पर गुज़रा. उनकी ज़िंदगी में मां की भूमिका ही ऐसी थी, जिसकी पूर्ति संभव नहीं थी. बहरहाल तबीयत कुछ संभली तो उन्होंने फिर से गाना शुरू किया. 1952 में बेगम अख़्तर ने ऑल इंडिया रेडियो के अखिल भारतीय संगीत समारोह में शिरकत की और महफिल लूट ली. इसके बाद फिर से बेगम अख़्तर की शोहरत आसमान छूने लगी. रिकॉर्डिंग पर रिकॉर्डिंग होने लगीं. वो पूरे मुल्क में गाने के लिए बुलाई जाने लगीं. फिल्मों के ऑफर भी दोबारा आने लगे. मगर बेगम ने अभिनय पर हामी नहीं भरी. पार्श्वगायन भी नाचरंग (1953), दानापानी (1953) और एहसान (1954) जैसी कुछ ही फ़िल्मों के लिए किया. हालांकि जलसाघर (1958) में ज़रूर वो गायन के साथ-साथ स्क्रीन पर भी दिखीं, क्योंकि ये अंतरराष्ट्रीय फलक पर पहचाने गए फिल्मकार सत्यजीत रे की फिल्म थी, जिनके आग्रह को बेगम ठुकरा नहीं पाईं. अब उन्हें विदेशों से भी न्यौते मिलने लगे थे. ख़ुद भारत सरकार उनसे सांस्कृतिक प्रतिनिधि मंडल का सदस्य बनने का आग्रह कर चुकी थी. 1961 में भारत सरकार के सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल में शामिल होकर वो पाकिस्तान गईं. वहां उन्होंने ग़ज़लों के साथ-साथ ठुमरी और दादरा का भी जादू चलाया. इस आयोजन में पहली बार बेगम को ये अंदाज़ा हुआ कि हिंदुस्तान की सरहद पार भी लोग दीवानावार उनके संगीत को सुनते हैं. 1963 की अफ़गानिस्तान और 1967 की रूस यात्रा में भी वो इसी तरह सब पर ग़ालिब रहीं. इस बीच एक के बाद एक उन्होंने कई विदेश यात्राएं कीं.
ख़ुद एक तजुर्बेकार गायिका के रूप में स्थापित होने के बाद बेगम ने अपना तजुरबा नई पीढ़ी को देने का मन भी बनाया. लड़कियां गाना सीखें, इस बात के लिए वो हमेशा पेश रहीं. उनकी मां ने उन्हें गाना सिखाने के लिए जो जद्दोजहद की थी, वो उसे भूली नहीं थीं. मां के इंतक़ाल के बाद उन्होंने विधिवत लड़कियों को तालीम देना शुरू किया. उस वक्त तक सिखानेवाले उस्ताद पुरुष ही होते थे, जो अपने शिष्यों के गण्डा बांधकर सिखाना शुरू करते थे. संगीत के क्षेत्र में गण्डा बंधन की परम्परा का बड़ा महत्व है. 1952 में बेगम अख़्तर पहली महिला उस्ताद बनीं, जिन्होंने अपनी शिष्याओं का गण्डा बंधन किया.  बेगम ने सबसे पहले शांति हीरानंद और अंजलि चटर्जी को गण्डा बांधकर सिखाना शुरू किया. उसके बाद दूसरी गायिकाओं ने भी अपनी शिष्याओं का गण्डा बंधन शुरू कर दिया. बेगम का सिखाने का तरीका भी नए ढंग का था. अकेले कमरे में सीखनेवाले को बैठाकर रियाज़ करवाने की वो क़ायल नहीं थीं. वे शिष्याओं को अपनी महफिल में साथ ले जातीं थीं और अपने साथ-साथ गाने को कहती थीं, और इसके बाद अगर ख़ास ज़रूरत पड़ी, तो अलग से भी सिखाती थीं. अख़्तर की शिष्याओं में शांति हीरानंद, अंजलि चटर्जी, रीता गांगुली, ममतादास, शिप्रा बोस आदि हैं. महाराज हुसैन निशात और सग़ीर खां आदि के रूप में उनके कुछ शिष्य भी रहे. बेगम ख़ुद इस्लाम में यकीन रखती थीं, लेकिन मजहबी भेदभाव से कोसों दूर थीं. उनकी शिष्याओं में ग़ैर-मुस्लिम लड़कियां ही अधिक रहीं.
शोहरत से इतर 1950 से 1974 का दौर उनकी गायिकी की शिनाख़्त के लिहाज से सबसे मज़बूत दौर था और काम के लिहाज से व्यस्ततम. देश-विदेश में अब वो हिंदुस्तानी उपशास्त्रीय गायन का सबसे बड़ा नाम थीं. 1968 में भारत सरकार ने संगीत में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया. 1972 में उन्हें केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड और 1973 में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड मिला. देश के दूसरे बड़े संगीत संस्थानों ने भी उन्हें सम्मानित किया. उनके शहर लखनऊ के मशहूर भातखण्डे संगीत संस्थान ने उन्हें प्रोफेसर का पद दिया. कामयाबी की इस मसरूफ़ियत के बीच उनकी तबीयत भी उन्हें अपनी अहमियत की चेतावनी देता रहा. 1967 में उन्हें दिल का पहला दौरा पड़ा. ठीक होने के तुरंत बाद वे फिर गाने लगीं. जिंदगी के आख़िरी साल 1974 में दोबारा उन्हें दौरा पड़ा. तबीयत संभली, तो फिर गायिकी शुरू. असल में गायिकी से दूर रहना उनके बस का ही न था. अक्टूबर 1974 में उन्होंने आकाशवाणी बंबई के सम्मेलन में शिरकत की और अपने इंतक़ाल के एक हफ्ते पहले आकाशवाणी के लिए अपनी आख़िरी ग़ज़ल सुना करो मेरी जां…’ रिकॉर्ड की. ये उन्हीं कैफ़ी आज़मी का कलाम था, जिन्होंने बेगम अख़्तर की गायिकी से मुतासिर होकर ही दोबारा ग़ज़लें कहना शुरू किया था.
गायन के क्षेत्र में जैसा नाम बेगम ने कमाया, वैसा लता मंगेशकर के अलावा किसी गायिका के हिस्से में नहीं आया. बेगम ख़ुद लता और बाद की तमाम गायिकाओं की प्रेरणा रहीं
30 अक्टूबर 1974 को अहमदाबाद के एक कार्यक्रम में गाते हुए एक बार फिर उन्हें दिल का दौरा पड़ा और इसी रात उनका इंतक़ाल हो गया. 1975 में भारत सरकार ने बेगम अख़्तर को मरणोपरांत पद्मभूषण से सम्मानित किया. उनकी मौत की ख़बर सुनकर दुनियाभर में उनके प्रशंसकों की हालत बुरी थी. कहा जाता है कि लखनऊ में तो उनका एक चाहनेवाला ये ख़बर सुनकर पागल हो गया था और लखनऊ की सड़कों पर हाए अख़्तरी-हाय अख़्तरी की आवाज़ लगाता उसी तरह भटकता था जिस तरह मजनूं दश्त में. बेगम की इच्छा के मुताबिक उन्हें लखनऊ के ही पसंदबाग़ स्थित अपनी मां की कब्र के पड़ोस में दफ़नाया गया. बेगम की मौत के बाद लंबे समय तक ये जगह लगभग उपेक्षित रही. आसपास के लोगों तक को इसके बारे में जानकारी नहीं थी. फिर अभी तीन साल पहले लखनऊ की जानी-पहचानी सामाजिक संस्था सनतकदाने बेगम की शिष्या शांति हीरानंद के सहयोग से उनकी मज़ार का जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण करवाया. साथ ही इस बात के लिए भी प्रयास किया कि इस जगह के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा लोग जानें. फेसबुक पर भी बेगम अख़्तर की मज़ार का एक पेज बनाया गया. संस्था के ही प्रयास से हर साल बेगम के जन्मदिन पर यहां संगीत की एक नशिस्त भी आयोजित होती है, जिसमंे शुभा मुद्गल और शांति हीरानंद आदि बेगम को श्रद्धांजलि दे चुकी हैं.

Friday, November 7, 2014

पीपल वाले पीर की फिल्‍म 'जेड प्‍लस'

पीपल वाले पीर की फिल्म

वरिष्ठ फिल्मकार चंद्रप्रकाश द्विवेदी अपनी नई फिल्म जेड प्लस के जरिए एक नई इबारत लिखने की कोशिश कर रहे हैं.

जेड प्लस उस मोहल्ले से निकली है जिसमें वेलकम टू सज्जनपुर, सारे जहां से महंगा, वार छोड़ ना यार, तेरे बिन लादेन जैसी फिल्में बसती हैं. अपने आस-पास की घटनाएं, आस-पास की राजनीति, वहीं का समाज, वहीं की छुद्रताएं, वहीं की उदारता. सौ करोड़ रुपये के नशे में डूबी, चमचमाती कारों, शानदार बिल्डिंगों और विश्वास से परे दृश्यों से इसका दूर-दूर तक लेना देना नहीं है. फिल्म के निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी एक बार फिर से एक अनूठी टीम के साथ सामने आए हैं. पुराने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के साथी, चाणक्य और पिंजर के सहयोगी और साथ में मोना सिंह और आदिल हुसैन जैसे कुछ नए साथी.
जेड प्लस की कहानी मौजूदा भारत के एक छोटे से गांव में बसने वाले आम आदमी और इस देश की शीर्ष राजनीति के आपसी संबंधों की कहानी है. कहानी इस मायने में जरूरी है कि देश की राजनीति बुरी तरह से उन्हीं लोगों से कटी हुई है जिनसे उसकी सारी ताकत आती है. साथ ही कहानी छोटे-छोटे कई ताने-बाने को भी उधेड़ती है. मसलन जो सरकार सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ने का दम भरती है वह अपनी सरकार बचाने के लिए किस हद तक सांप्रदायिक हो सकती है कि अपने सारे राजनैतिक कौशल और कामकाज को किनारे रख कर दरगाह पर चादर के भरोसे हो जाती है. इतना ही नहीं जब वह राजनीति अपने दिखावे में संवेदनशील होना चाहती है तब ऐसा काम करती है जिससे उसकी साख और समझ दोनों पर सवाल खड़ा हो जाता है. वह गांव के एक पंक्चरवाले को जेड प्लस सुरक्षा मुहैया करवाती है. सरकार की यह नेमत गांव के गरीब पंक्चरवाले की जिंदगी में किस किस्म की उथल-पुथल ले आती है उसी उठापटक और असमंजस का नाम है जेड प्लस. अपनी छवि के विपरीत और इस समय में जेड प्लस की जरूरत पर डॉ. द्विवेदी कहते हैं, ‘भारतीय समाज के लिए पिछले कुछ साल बेहद उठापटक भरे रहे हैं. एक समाज के स्तर पर, इस पर कई तरह के प्रश्न खड़े हुए हैं, लेकिन साथ ही यह समय समाज में आई चेतना और जागरुकता का समय भी रहा है. समाज के हर हिस्से में देश के नए स्वरूप को तय करने की ललक उठ रही है. इसके नतीजे में हम देख रहे हैं कि देश एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है. आम आदमी की इच्छाएं और महत्वाकांक्षाएं राजनीति में जगह पाने लगी हैं. सामाजिक मंचों से लेकर टेलीविजन तक पर इन बदलावों की सुगबुगाहट है. लेकिन भारत का सिनेमा इससे एक हद तक अभी भी अछूता है. मेरी कोशिश है कि इन बदलावों और आम आदमी को फिल्मों में भी जगह मुहैया करवाई जाय.’
डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी के पिछले कामकाज की बात की जाए तो वह प्राचीन भारतीय इतिहास और साथ ही सामयिक भारतीय साहित्य से गहरे तक प्रभावित रहा है. चाणक्य हो, उपनिषद गंगा हो, पिंजर हो या फिर रिलीज के इंजार में बैठी मोहल्ला अस्सी. खुद उनके शब्दों में, ‘लोग अपने आस-पास की चीजों से ज्यादा आसानी से जुड़ते हैं. मैं भी उन्हीं का हिस्सा हूं. मुझे भी भारतीय साहित्य और इतिहास की वो कहानियां गहराई तक प्रेरित करती है जिन्हें हम पीढ़ी दर पीढ़ी सुनते पढ़ते आ रहे हैं. इसके अलावा मुझे इस मायने में भी अपने काम से एक सुख मिलता है कि एक नए माध्यम (फिल्म) में इन चीजों का दस्तावेजीकरण हो रहा है.’ तो क्या जेड प्लस का भी ऐसा ही कोई साहित्यिक-ऐतिहासिक संबंध है? वे बताते हैं, ‘इस कहानी का प्रवेश चंदा मामा और बेताल पचीसी जैसी कहानियों की तरह मेरे जीवन में हुआ. मेरे एक मित्र हैं राम कुमार सिंह. राजस्थान के हैं. उनकी रचनाओं के लिए उन्हें राजस्थान साहित्य अकादमी का प्रतिष्ठित रागे राघव पुरस्कार मिल चुका है. उन्होंने कुछ साल पहले मुंबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के दौरान मुझे जेड प्लस की कहानी मेरा समय काटने के लिए सुनाई थी. जिस अंदाज में और जिस रस के साथ वे कहानी सुना रहे थे उसने मुझे पहली बार में ही कहानी का मुरीद कर दिया. मेरे आग्रह पर उन्होंने पहले कहानी का ड्राफ्ट भेजा और फिर कुछ दिन बाद कहानी का कॉपीराइट भी मुझे सौंप दिया. तो आप कह सकते हैं कि फिल्म का और मेरा इतिहास और साहित्य से जुड़ाव अभी भी कायम है.’
रामकुमार सिंह से कहानी के अधिकार मिलने और फिर उसके फिल्मी कहानी में तब्दील होने की कहानी भी लंबी और दिलचस्प है. इस कहानी से डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी के व्यक्तित्व के कई और पहलू भी सामने आते हैं. मसलन रामकुमार जो कि राजस्थान के उसी फतेहपुर से आते हैं जो इस फिल्म की पृष्ठभूमि है. लेखक और निर्देशक दोनों के बीच फिल्म के संवादों को लेकर अपने-अपने आग्रह थे. डॉ. द्विवेदी फिल्म को नई कहावतों और मुहावरों के जरिए कम्युनिकेशन सेंट्रिक बनाना चाहते थे न कि डायलॉग केंद्रित. इस समस्या से निपटने के चक्कर में फिल्म के ड्राफ्ट पर ड्राफ्ट बनते गए. अंतत: 23वें ड्राफ्ट के बाद स्क्रिप्ट अपने असली रूप में सामने आई. आज जब वे पीछे मुड़कर देखते हैं तो पाते हैं कि उनके पिछले कामों में भी सुधार की बहुत गुंजाइशें हैं. वे कहते हैं, ‘मैं यही सीख पाया हूं कि स्क्रिप्ट लेखन असल में लिखना और फिर उसे बार-बार लिखने का नाम है. पिंजर की स्क्रिप्ट मेरा पहला ड्राफ्ट था और वही आखिरी ड्राफ्ट था. आज अगर मुझे इसे लिखने को कहा जाय तो मैं इसमें तमाम फेरबदल करूंगा. मोहल्ला अस्सी के कुल चौदह ड्राफ्ट बने. और अब जेड प्लस 23 ड्राफ्ट के बाद सामने आ पाया है.’
अपनी कहानियों की तरह ही द्विवेदी अपने पात्रों के मामले भी बहुत सावधान रहते हैं. एक बार फिर से उन्होंने संजय मिश्रा, मुकेश तिवारी जैसे पुराने साथियों को जोड़कर फिल्म के मोटी मोटा मिजाज का संकेत लोगों को दे दिया है. बिना किसी बड़े नाम और तड़क भड़क के उन्होंने बाकी सबकुछ दर्शकों के ऊपर छोड़ दिया है. इस बार उन्होंने दो नए साथी भी ढूंढ़े हैं जिनका जिक्र करना जरूरी है. पहला नाम है फिल्म के मुख्य कलाकार आदिल हुसैन का यानी फिल्म का असलम पंक्चरवाला. यह सुझाव उन्हें उनकी पत्नी मंदिरा से मिला. हुसैन की अपनी फिल्मी यात्रा उन्हें जेड प्लस जैसी फिल्मों का स्वाभाविक दावेदार बनाती है. इससे पहले विशाल भारद्वाज की इश्किया के अलावा इंगलिश विंगलिश और लाइफ ऑफ पाई में दर्शकों का पाला उनसे पड़ चुका है. आदिल हुसैन के शब्दों में, ‘शायद कोई दूसरा निर्देशक मेरे भीतर के उस एक्टर को नहीं देख सकता था जो विटी है, ह्युमरस है, जो कॉमेडी कर सकता है. डॉ. साब ने मेरी उस क्षमता को पहचाना और मौका दिया. उनके साथ मेरे बेहतर तालमेल की एक वजह यह भी रही कि हम दोनों ही छोटे शहरों से आए लोग हैं. शरारत और बदमाशी तो उनमें भी है लेकिन छोटे शहरों वाली मासूमियत उनके भीतर अभी भी बची हुई है. इसके अलावा अपने काम पर उनकी पकड़ का कोई जवाब नहीं है. एक-एक शब्द और डायलॉग वे जिस तरह से चुनते हैं वह उनके काम के लिए उनका समर्पण दिखाता है. इसीलिए वे एक एक शब्द को बनाए रखने पर जोर देते हैं, बिना उसे बदले.’
‘हम दोनों ही छोटे शहरों से आए लोग हैं. शरारि और बदमाशी िो हम दोनों में ही है लेककन छोटे शहरों वाली मासूकमयि उनके भीिर अभी भी बची हुई है’
द्विवेदी की दूसरी नई पसंद हैं एक्टर मोना सिंह जो फीमेल लीड कर रही हैं. इस नाम का सुझाव भी मंदिरा ने ही दिया था. पर सुझाव से उनके जुड़ाव तक की कहानी बड़ी ही दिलचस्प है. मोना के बिजनेस मैनेजर ने पहले मंदिरा से निर्देशक का रेज्युमे मांगा. इस पर मंदिरा ने उनसे निर्देशक का नाम गूगल पर सर्च करने के लिए कहा. किसी तरह से मोना डॉ. द्विवेदी से मिलने को राजी हो गईं. मोना को कहानी बताने से पहले उन्हें मैनेजर को यह भरोसा देना पड़ा कि उनके पास फिल्म और मोना सिंह को निर्देशित करने की पूरी क्षमता और योग्यता है. खैर बात आगे बढ़ी और मोना सिंह फिल्म करने के लिए राजी हो गईं. शूटिंग के पहले ही दिन फिल्म के संवाद को लेकर मोना और डॉ. द्विवेदी के बीच कुछ बातें हुईं. डॉ. द्विवेदी ने मोना के सामने जयशंकर प्रसाद की एक कविता कही और उसे मोना से दुहराने या लिखने को कहा. इसके बाद उन्होंने गुलजार का एक गीत सुनाया और उसे मोना से लिखने को कहा. बात मोना को समझ आ गई. इसके बाद उन्होंने फिल्म के किसी भी संवाद में एक भी शब्द का हेरफेर करने की जिद नहीं की.
फिल्म को एक मोटे दायरे में देखें तो यह समाज के सबसे निचले और सबसे ऊंची पायदान पर पहुंचे आदमी के बीच का अंतर है, उनके बीच के विरोधाभास हैं, और पूरी कहानी के दौरान मौजूद एक ब्लैक ह्यूमर है जो अपनी पूरी कड़वाहट और गड़बड़ियों में भी दूसरों को हंसने का मौका देती है. और साथ में जेड प्लस सत्ता में बैठकर ताकत की कैंची चलाने वाली उस राजनीति की कहानी तो है ही जो खुद की जड़ें भी काट चुकी है.

‘सिनेमा अाज भी मेरे लिए जुनून है’ 
पिंजर जैसी बहुचर्चित फिल्म के निर्देशक  डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी अपनी नई फिल्म जेड प्लस के साथ एक बार फिर से दर्शकों के सामने हैं. फिल्म के प्रोमो रिलीज से पहले  अतुल चौरसिया के साथ हुई उनकी बातचीत

क्या अब मान लिया जाए कि डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी इतिहास के पन्नों से बाहर निकल चुके हैं?
नहीं, इसमें भी आपको देश के 67 सालों के इतिहास की झलक मिल जाएगी. जो राजनैतिक उथल-पुथल इस पूरे समय में देश ने देखी है, और वह जिन वजहों से हुई है उसकी झलक इसमें दर्शकों को मिल जाएगी. यह एक राजनैतिक-सामाजिक व्यंग्य है. मेरा यह भी मानना है कि देश का जो भी साहित्य लिखा जाता है वह कहीं न कहीं उसके इतिहास का दस्तावेज होता है. हमारे प्राचीन शास्त्र भी यही कहते हैं कि नाट्य शास्त्र भी इतिहास की श्रेणी में रखा जाता है. नाट्य के जरिए हम अतीत की अनुकरणीय घटनाओं का उल्लेख करते हैं. मैंने इतिहास की जमीन नहीं छोड़ी है. इसमें भी मैं गाहे बगाहे इतिहास को छूते हुए निकल जाता हूं.
अपनी फिल्म जेड प्लस के बारे में कुछ बताएं. 
जेड प्लस राजनैतिक व्यंग्य है. एक मिली-जुली साझा सरकार जो सांप्रदायिकता और भ्रष्टाचार से जूझ रही है. सरकार के घटक दल किसी भी समय समर्थन वापस लेने को तैयार बैठे हैं. और ऐसे समय में सरकार का एक सहयोगी दल एक ऐसे विचार के साथ सामने आता है जो बेहद दिलचस्प है. उसका दावा है कि सरकार अगर राजस्थान के फतेहपुर में पीपल वाले पीर की दरगाह पर चादर चढ़ाती हैं तो उसकी सारी समस्याओं का अंत हो जाएगा. मरता क्या न करता की तर्ज पर प्रधानमंत्री पीपल वाले पीर की दरगाह पर चादर चढ़ाने को राजी हो जाते हैं. फतेहपुर पहुंचकर प्रधानमंत्री की मुलाकात एक पंक्चर वाले से होती है और उसके बाद एक प्रधानमंत्री और पंक्चरवाले के बीच बातचीत और घटनाओं की जो दिलचस्प कड़ी तैयार होती है वह राजनीति की विद्रूपताओं और उसके समाज से कटाव की कहानी को एक मनोरंजक अंदाज में रखती चली जाती है.
हमारी राजनीति में जो भ्रष्टाचार, संप्रदायवाद या अवसरवाद जैसी गहरी और बड़ी समस्याएं हैं उन्हें व्यंग्य जैसे हल्के माध्यम से कहना कितना सही हैं. क्या व्यंग्य ही गंभीर चीजों को लोगों तक पहुंचाने का सबसे सफल माध्यम है.
इसके कई कारण है. एक कारण यह है कि व्यंग्य पर हमारे यहां बहुत कम फिल्में बनी हैं. दूसरा राजनीति में आम जनता की रुचि नहीं है. समाज की जिन कड़वी सच्चाइयों की बात आप कर रहे हैं वह व्यक्ति अखबार टेलीविजन के जरिए हर दिन देखता रहता है. इसलिए जब वह थिएटर में जाता है तब उसे कुछ नया चाहिए होता है. और जब आप अपने कहने की शैली बदल देते हैं तो लोगों की रुचि बढ़ जाती है. हर दिन हमारे संपादकीयों में कड़े प्रहार होते हैं. शरद जोशी और हरिशंकर परसाईं इसीलिए सफल रहे क्योंकि उन्होंने एक अलग शैली में चोट की. उन शैलियों में अगर हास्य जुड़ जाए तो वह ज्यादा कारगर होता है. गंभीर बात को गंभीर तरीके से कहना तो आम बात है. लेकिन उसी गंभीर बात को हंसते-हंसते कह दिया जाए और आपका काम भी हो जाए तो यह किसी भी फिल्मकार की सबसे बड़ी सफलता है.
आपका अब तक का कामकाज देखें तो हम पाते हैं कि वह इतिहास और साहित्य के साए में रहा है. प्राचीन भारतीय कथाएं भी आपको बहुत आकर्षित करती हैं. चाणक्य से लेकर उपनिषद गंगा तक सारा कामकाज इसका सबूत है. आपने एक बार महाभारत बनाने की कोशिश भी की थी. ऐसा क्यों हैं.
मुझे लगता है कि ये सारी कहानियां टाइम टेस्टेड हैं. समय ने इन कहानियों को अच्छी तरह से परख लिया है. नाट्य शास्त्र में इस बात को मजबूती से कहा गया की ऐसे चरित्र जिन्हें हम जीवन मंे देख सकें और जिनसे कुछ पा सकें, जो हमारे आस-पास का हो, तो वह लोगों को आसानी से समझ आ जाते हैं. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि ईश्वर ने हमें दो आंखें आगे दी तीसरी आंख क्यों नहीं दी. क्या उसने गलती की. नहीं उसने गलती नहीं की है असल में हमारी तीसरी आंख हमारा इतिहास है. यह इतिहास की ताकत है. इतिहास हमें इतनी ताकत देता है कि हम वर्तमान की समस्याओं का उत्तर अपने अतीत में खोज सकते हैं. इसीलिए इतिहास मुझे आकर्षित करता है. अगर हम सांप्रदायिकता की बात करें तो मुझे लगता है कि हमने हमेशा इस मसले को कालीन के नीचे छुपाने का काम किया. कभी भी इस पर ईमानदारी से बात नहीं की. फिल्मों में भी हमने इस पर बहुत छिछले तरीके से चर्चाएं देखी हैं.
साहित्य और इतिहास पर फिल्म बनाने की परंपरा पश्चिमी फिल्मों में बहुत गहरी और लंबी रही है. इसके विपरीत भारतीय फिल्म जगत में यह परंपरा बहुत कमजोर दिखती है. आपको और एकाध और लोगों को छोड़ दें तो हमारे यहां ऐसे नाम और फिल्में कम हैं.
बिल्कुल, इसका कारण यह है कि हमारा समाज ऐसा है कि इसको अक्सर शब्दों तक से आपत्ति हो जाती है. यहां जितनी ऐतिहासिक फिल्में बनती हैं उसको लेकर कोई न कोई विवाद हो जाता है. कल जो शब्द प्रचलित थे वे आज नहीं हैं. लोग थिएटरों पर पत्थरबाजी करते हैं. इससे निवेशक को लगता है कि वह चला था कुछ और करने हो कुछ और रहा है. इतिहास को लेकर हमारे यहां भय है. एक और गंभीर समस्या यह है कि हमें अपने इतिहास को लेकर गर्व नहीं है. उससे एक तरह का डिसकनेक्ट है. एक वजह यह भी है कि हमें ऐतिहासिक विषयों में बड़ी सफलताएं नहीं मिली हैं. पश्चिम में देखें तो उनकी ऐतिहासिक फिल्मों को बड़ी सफलताएं मिली हैं. क्लियोपेट्रा को देखें तो पहली को छोड़कर बाद में बनी दोनों फिल्मों को बड़ी सफलता मिली. तीसरी बार जो सीरीज बनी वह सर्वश्रेष्ठ थी. इस तरह के प्रोजेक्ट लगातार चल रहे हैं वहां. हमारे यहां ऐतिहासिक पात्रों को लेकर ज्यादा रुचि नहीं है. इसके अलावा एक कारण यह भी है कि इतिहास पर फिल्में बनाने में लंबा वक्त लगता है और काफी अध्ययन करना पड़ता है. लोगों को लगता है कि इतना समय लगाने के बाद विवाद हो तो इससे अच्छा है कि कम समय में कुछ और कर लिया जाए.
आप अक्सर कहा करते हैं कि आपको विदेशी साहित्य और इतिहास की बजाय भारतीय कहानियां ज्यादा रास आती है.
मैं सारे बिंब भारतीय समाज से ढूंढ़ता हूं. मैं हमेशा कहता हूं कि मैं अपने दिमाग के द्वार हमेशा खुले रखता हूं. मैं सिनेमा कम देखता हूं. जब तक मुझे विचार प्रेरित नहीं करते तब तक मैं फिल्म नहीं बनाता हूं. अभी भी मैंने सिनेमा को जुनून के स्तर पर ही बनाए रखा है.
आज से दस या बीस साल बाद जब हम मुड़कर देखेंगे और डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी की समीक्षा करेंगे तब हम पाएंगे कि एक बड़े फिल्मकार के हिस्से में कुल तीन-चार फिल्में ही दर्ज हैं. यह किसकी असफलता होगी?
कुछ हद तक यह मेरी असफलता है. और कुछ हद तक समाज ने इस तरह के काम को स्वीकार नहीं किया है. मैं ऐसे कई लोगों से मिला हूं जो चाणक्य को रिफरेंस के तौर पर इस्तेमाल करते हैं. श्रीलंका में बुद्ध के ऊपर एक फिल्म बन रही थी तब उन्होंने चाणक्य को बार-बार देखा. इसी तरह से पिंजर का इस्तेमाल रिफरेंस के तौर पर लोग करते हैं. यह कम सफलता नहीं है